निशाँ-ए-रहमत

तन्हाई में उतरती रहमत की एक ख़ामोश आहट।

ख़्वाब में रेत पे इक उम्र उतरती देखी, धूप में अपनी ही परछाईं सँवरती देखी।
जब तलक राह पे मौसम थे मेहरबाँ मुझ पर, दो निशाँ साथ थे—इक मेरी, इक तेरी देखी।
दिन भले थे तो हर इक मोड़ पे तू साथ लगा, हर ख़ुशी में तेरी आहट भी गहरी देखी।
फिर वही मोड़ मेरी आँखों के सामने आया, जिसने हर साँस को सीने में ठहरती देखी।
जब न कोई था मेरा, और न सहारा कोई, जब दुआ भी मेरे होंठों पे ठहरती देखी।
जब मेरा दिल भी मेरे साथ चलने से थका, रेत पर सिर्फ़ एक ही चाल लिखी क्यों देखी?
दिल ने रोकर कहा— “ऐ मेरे मालिक, ये बता, सबसे भारी घड़ी में तेरी कमी क्यों देखी?
तू तो कहता था कि हर वक़्त मेरे साथ है तू, फिर मेरी रात ने तेरी कोई झलक क्यों न देखी?
जब मेरी आँख में आँसू थे, मगर आवाज़ न थी, मुझ तक आती हुई तेरी नज़र क्यों न देखी?
मैं भी ढूँढता रहा तुझको अपने बाहर-बाहर, अपने अंदर की तरफ़ मैंने नज़र क्यों न देखी?”
एक ख़ामोश-सा नूर उतरा मेरे सीने में, जैसे वीराने ने चुपचाप सहर-सी देखी।
फिर लगा जैसे उसी चुप ने मुझसे कहा—
“ऐ मेरे अपने, तूने रेत तो बहुत देखी, मगर बात न देखी।
दो निशाँ थे जहاँ, तू मेरे बराबर चलता था, तेरे क़दमों में अभी चलने की ताक़त देखी।
और जहाँ एक ही निशाँ था तेरी राहों में, वहाँ तेरे पाँव में चलने की हिम्मत न देखी।
तेरी आँखों में यक़ीं बुझने को आया था जहाँ, तेरी साँसों में भी जीने की चाहत कम देखी।
उस घड़ी मैंने तुझे राह पे छोड़ा ही नहीं, तेरी थकती हुई रूह अपनी बाँहों में देखी।
तू जिसे अपनी तन्हाई का सबूत समझा, वो मेरी गोद थी—तूने मेरी चाहत न देखी।
पर ये भी सच है कि दर्द तेरा झूठा न था, मैं था पास, मगर तूने मेरी आहट न देखी।
तेरी शिकायत भी सच्ची थी, मेरा होना भी, तूने आधी रात देखी, पूरी सहर न देखी।
मैं तेरे सामने होता तो नज़र आ जाता, मैं तेरे भीतर था—तूने ये गहराई न देखी।”
अब समझ आया कि हर ग़म कोई सज़ा नहीं होता, हर अँधेरे में जुदाई की वजह नहीं होती।
जिस जगह एक ही निशाँ मिले रेत पर, ऐ दिल, वहाँ अक्सर कोई इंसान अकेला नहीं होता।
उस एक निशाँ को तन्हाई का इल्ज़ाम न दे, कभी-कभी रब इतना पास हो कि साया नहीं होता।
और शायद राज़ यही है कि कुछ घड़ियों में, साथ भी सच होता है—और अकेलापन भी झूठा नहीं होता।
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